जिसे जवाब देना था उसी ने सवाल कर दिया…

”वक़्त की क़ैद में ज़िंदगी है मगर
चंद घड़ियां यही हैं जो आज़ाद हैं…”

लिखना शुरू ही किया था कि ये गाना बज गया.

उनकी शुरुआती बातचीत कुछ ऐसी ही थी. रोज़ाना कुछ चंद घड़ियां चुराते अपने काम से और मिलते, बातें करते. तमाम सारी बातें. शायद कई साल का गुबार एक दूसरे से साझा कर रहे थे. जो ज़िंदगी में घटा लेकिन बहुत से लोगों को पता नहीं रहा कभी.

चंद दिनों की बातचीत के बाद एक दिन उसने मैसेज किया.
हमारे बीच चीज़ें बदल रही हैं ना?
हां शायद. लेकिन इतना भी नहीं कि तुमको कोई परेशानी होने लगे.
जवाब मिला, नहीं परेशानी नहीं है लेकिन थोड़ा डर है. कुछ अजीब ना हो जाए.

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खैर,
बातें बदलीं… कुछ और बात होने लगीं.
रोज़-रोज़ बातें, दो-चार दिन में मिलना.
कई घंटे साथ में बिताना.
यह कितना खूबसूरत लगता रहा.

उससे मिलने के लिए मेट्रो का एक घंटे का सफ़र भी पता नहीं चलता था. वरना आधे घंटे की दूरी पर ऑफिस है, वहां जाने में मौत सी आती है कभी-कभी.

लेकिन ये बातें, ये मिलना, ये खुशी ज़्यादा दिन नहीं टिकी.
पता नहीं क्यों
शायद कोई ग़लती हुई
या ना जाने क्या
थोड़ी दूरी सी आती गई
वो हर बात पे चिड़चिड़ाती
शायद किसी बात से नाराज़ थी
किसी बात से परेशान थी

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हम सब की ज़िंदगी में मुश्किल दौर आते हैं. हम दुखी होते हैं, डिप्रेशन में होते हैं, हम खोए होते हैं, हम बहुत कुछ गंवा चुके होते हैं, हम अंदर से टूट चुके होते हैं, लेकिन जब सामने से आकर कोई एक शख़्स हाथ बढ़ाकर कहे कि चलो, थोड़ी देर के लिए सारी फिक्र भूल जाओ, तो उसकी सुन लेनी चाहिए. हमेशा अपनी ज़िंदगी और परेशानियों में उलझे रहने से ना ज़िंदगी सुलझ जाएगी और ना ही वो रिश्ता जो शायद कहीं बीच में अटका हुआ है. इस उलझन में कि मैं हूं भी या नहीं.

क्या हम रिलेशनशिप में हैं?
उस दिन अचानक आया ये सवाल बहुत अजीब लगा
अब ये कई बार याद आता है
जब भी घर के उस कोने की तरफ देखता हूं
जहां बैठे हुए उसने तिरछी आंखों से देखते हुए ये सवाल किया था.
इस बात का जवाब नहीं पता
और पता हो भी कैसे
जिसे जवाब देना था उसी ने सवाल कर दिया.

                                                                                                                … To be continued…

उधर कांवड़ियों का ‘बोल बम’, इधर अपुन बोला हम ही हम…

हां तो भक्तजनों!
काफ़ी लंबा वक़्त हो गया था और अपुन झोला उठा के कहीं गया ही नहीं. सावन शुरू हो गया था. उधर कांवड़िये अपना बोल बम की तैयारी कर रहे थे, इधर अपुन बैकपैक की तैयारी में लगे थे. उधर कांवड़ियों ने डीजे रेडी किया और तिरंगा लहराते सड़क पर निकले, इधर अपुन ने अपना झोला उठाया, काला चश्मा लगाया और निकल लिए ट्रेक यात्रा पे. बस वाले ने रास्ते भर वही गाने सुनाए जिनका कांवड़िए रीमेक वर्जन सुनते हैं.

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लेकिन बिना प्लान के जो प्लान बनता है ना वो होता गज़ब है. तो होता ये है कि जाना था जापान और पहुंच गए चीन. मलतब जाना था स्पीति और पहुंच गए मनाली. दिल्ली से बस पकड़ी और ऐसी पकड़ी की छूटी ही नहीं. सीधे 16 घंटे बाद मोहभंग हुआ. जब लगने लगा था कि या तो भाई पहुंचा ही दो या रस्ते में ही उतार तो कहीं. यहां आई वाज़ फीलिंग जेलस विद कांवड़िया. अपुन को लगा कि स्याला ये तो कहीं भी भोंपू रोक देता है और आराम करता है.

खैर, एन-केन-प्रकारेण, दिल्ली से मनाली तो पहुंच गए. घूमने जाओ तो जुगाड़ बेहद जरूरी हैं. वरना पइसा बहुत खर्चा होता है और मज़ा आधा हो जाता है. इसलिए अपन ने लगाया जुगाड़ और बुक किया होटल. मस्त एकदम स्नो व्यू वाला. ऐसा व्यू कि देखते ही तबीयत हिमालय हो जाए.

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थोड़ा आराम फरमाए. थोड़ा ‘चिल’ करने की कोशिश में ठंडे पानी से ही नहा लिये. और फिर निकले सैर में. रोहतांग से पहले पड़ता है गुलाबा वहां तक फर्राटा भरते हुए दोस्त की गाड़ी से घूम आए. मस्त खुली हवा, सन्नाटे वाला पहाड़ और अपन. पहाड़ का घुमाव वाला रास्ता अपन का फेवरेट है. बोले तो एकदम दिल से प्यार वाला. इसलिए अपनी यात्रा में डीजे नहीं ब्लूटूथ स्पीकर था. जिसका मज़ा तब है जब इसे स्लो भाल्यूम में बजाओ और बगल में सुनने वाला भी चिलम छोड़ के गाने पे ध्यान देने लगे.

वहां से निकले थोड़ा दिन ढले. उसके बाद गए सोलन वैली गए. वहां जा के एक कहावत याद आई और जिसने भी लिखा होगा, उस पर गुस्सा भी. कहावत ये है- ”लौटना सुकून देता है…”

तो हमको गुस्सा इसलिए आया कि भई जब हम पहले आए थे यहां तो यहां था बर्फ का पहाड़. खूब लोटे थे बरफ पे. अब था घास का पहाड़. मज़ा किरकिरा.

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खैर, वहां से लौटे तो मॉल रोड घूम के पहुंच गए होटल. अगले दिन तैयारी थी काज़ा जाने की लेकिन रातों-रात की गई रिसर्च ने प्लान की ऐसी धज्जियां उड़ाईं कि अगले दिन रिपीट मोड में ‘दिल के टुकड़े-टुकडे करके…’ वाला गाना सुना. खैर अगला पड़ाव तय हुआ कसोल.

अब जाना था कसोल लेकिन रुके सीधे तोश में. तोश भी जगह ऐसी कि पहले जाने का मन नहीं था और वहां जा के वापस आने का मन नहीं था. मल्लब ये कुछ वैसी ही फीलिंग थी जैसे कोई कांवड़िया रास्ता भटक के हरिद्वार के बजाय कैलाश मानसरोवर पर कमंडल ले के पहुंच गया हो.

खैर, बस, टैक्सी से तोश की धरती पर कदम रखने के बाद तमाम लोगों से पूछते-पूछते एक घंटे तक पहाड़ पर घूमते चकराते उस जगह पहुंचे जहां झरना दिखा. और झरना दिखा तो बैग फेंक के अपन तो कूद लिए. ठंडा पानी खोपड़ी में समाया तो थकान मिट गई. अब अपुन को अच्छा फील होने लगा था. मन तो किया नहा लिया जाए, अपन ने भावना को कंट्रोल किया. फिर तलाश शुरू हुई कैंप की.

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जिस कैंप को ढूंढ़ते हुए हम पहाड़ पर पहुंचे थे उसका रेट सुनकर ही मन किया कि अब या तो वापस लौट जाऊं या फिर जितना पैसा मांग रहा है दे दूं. खैर, बात करने से ही बात बनी और कुल जमा 500 रुपये में भाईसाब ने टेंट दे दिया. उस पहाड़ी कोने पर, झरने के बगल में लगे दो टेंट. यानी टूरिस्ट के नाम पर सिर्फ सन्नाटा था और टेंट वाले का स्टाफ था.

टेंट रेडी हुआ और ऑर्डर देने के 30 मिनट बाद गरमा गरम पराठे आ गए. ठंड तो ठीकठाक थी और उस ठंडक में गरमागरम आलू पराठे खा के ऐसा लगा जैसे हफ्तों से खाना ही नहीं खाया था. अद्भुत था वो.

जैसे-जैसे रात हुई झरने की आवाज़ और ज़्यादा सुनाई देने लगी. जहां दिल्ली में स्याला भकाभक गर्मी थी वहां पहाड़ पे दो रजाई ओढ़ के सो रहा था मैं. गज़ब की नींद आई. सुबह नींद खुली तो सामने हल्की सी रोशनी थी, बादल थे और चिड़ियों की आवाज़ थी. मन किया- अपुन को यहीं बसना मांगता है.

बादलों के बीच योग करते हुए तोड़ा ‘चिल’ किया और 12 बजने से पहले ही निकल पड़े फिर से झोला उठा के.

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थोड़ी दूर चलकर आए तो फिर वही झरना मिला. अबकी बार रहा नहीं गया और अपुन कूद गया झरने के जमा देने वाले ठंडे पानी में. पानी इतना ठंडा था कि लगा अब हाथ पैर शायद ही चलें, लेकिन बाहर निकलते ही जो गज़ब की एनर्जी फील हुई. अपुन फिर से कूद गया.

बहुत देर तक यही चलता रहा. आखिरकार मैंने अपने मन को शक्ति दी और कहा कि निकल लो बेटा यहां से. वरना ठंड लगी तो प्राण निकल लेंगे फिर मचलते रहना इसी पानी में.

ये पूरी ट्रिप का सबसे खूबसूरत और सुकून देने वाला डेस्टिनेशन था. उसके बाद मणिकर्ण, कसोल, कुल्लू सब जगह गया लेकिन मन यहीं टिक गया. कुल्लू में तो अगला पूरा दिन होटल में पड़े-पड़े बिता दिया, लेकिन वहां सब कुछ मिलने के बाद भी ध्यान तो पहाड़ के उसी झरने पर अटका रहा. आज भी वहीं अटका है.

कुछ तारीखें… कुछ दिन… कुछ पागलपन…

ना कोई दोस्ती, ना जान पहचान. एक अनजान शहर में दो दिन बिता दिए. खुद को ढूंढने की कोशिश में. जो खोया हुआ है उसे पाने की कोशिश में. जब हम अकेले होते हैं तो मन में कितना कुछ चल रहा होता है. कभी कभी बस फूट पड़ना चाहता है मन. बेवजह. 

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अपनी पुरानी बातें, ईमेल के कुछ हिस्से, शिकायतें, हिदायतें, सब कुछ जब पब्लिक स्पेस पर दिखता है तो मन उचटने लगता है. लगता है जैसे सब उसी तरह बेवजह था, जैसे आज बेवजह मैं बैठा हूं, कहीं दूर.

फिर लगता है कि जो बात परवाह में कहीं गई थी, वो महज एक फेसबुक स्टेटस के अलावा कुछ नहीं है. बेवजह होने वाली लड़ाइयां, गलतफहमियां और उनको सुलझाने के लिए लिखे जाने वाले ईमेल एक दिन सिर्फ फ़ेसबुक टाइमलाइन पर, “Nation wants to Know” जैसे सवाल उठाते नज़र आते हैं. आप कन्विक्ट घोषित हो चुके होते हैं. फिर वहां आपकी ना चॉइस होती ना ख्वाहिश, कि आप आगे बढ़कर कुछ सही कर सको. फिर सब बेवजह होता जाता है. ऑटो में बैठ कर सुने जाने वाले वाले गानों के अलावा फिर सब कुछ बदला सा लगता है. बस कुछ नहीं बदलता तो वो गाने ही हैं. दिल्ली हो या मुंबई या फिर कोई और शहर, कम से कम ऑटो वाले गाने तो एक जैसे होते हैं. mount

वो वक़्त, जब कुछ लिखने, कहीं घूमने के लिए मन कूद रहा होता है, जब पहाड़ के घुमाव वाले रास्ते से बसें गुजर रही होती हैं, तो बहुत कुछ में चल रहा होता है मन में. तमाम उलझनों को उन्हीं घुमाव वाले रास्तों पर भटकने के लिए छोड़ आना चाहिए. कुछ जगहें जहां जाना शायद कुछ याद करने या दोहराने जैसा होता है, वहां ज़रूर जाना चाहिए. अपनी गलतियों से सीखने के लिए. ताकि फिर बातें सिर्फ फ़ेसबुक स्टेटस भर ना रह जाएं. ताकि फिर, किसी की लिखी बात चुभे नहीं. किसी का पूछना अखरे नहीं.

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कुछ तारीखें… कुछ दिन… कुछ पागलपन. सब एक बार फिर घूम कर सामने आता है. लेकिन उसे फिर से सोच पाना और महसूस कर पाना शायद मुश्किल होता है. क्योंकि आप रह तो सिर्फ फेसबुक स्टेटस ही गए. जो एक साल बाद ‘On This Day’ की तरह फिर सामने आयेगा.

ज़िन्दगी को मेट्रो के सफर की तरह बोरिंग नहीं होना चाहिए. उसमें रोमांच लाने के लिए राजीव चौक और कश्मीरी गेट जैसे स्टेशन का होना बेहद ज़रूरी है. वरना सुस्त चाल से चलते हुए, मेट्रो के दरवाजे पर खड़े हुए, आप सिर्फ बाहर गुजरती नीरस चीजों को निहारते रह जाते हैं, या फिर दरवाजे के दूसरे कोने पर खड़े दोस्तों के उस गुट को देखकर बुझी हुई मुस्कान मन में ले आएंगे, जो कॉलेज के बैग कंधे पर लादे, एक दूसरे को टीज कर रहे होते है.

या ज़िन्दगी यमुना बैंक मेट्रो स्टेशन जैसी हो, जहां दो रास्ते हैं और उन पर आगे बढ़ने वाले प्रेमी गले लगाना नहीं भूलते. मन में कोई टीस नहीं होती, वो मुस्कुराते हुए सीढ़ियों पर दिखते हैं.

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लड़कियों, सिर्फ शराब की बोतलें ही नहीं, ये परंपरा भी तोड़ो

शराब का नाम आता है तो कुछ लोग ऐसे नाक सिकोड़ते हैं जैसे उल्टी उन्हीं के ऊपर कर दी हो. शराब के नाम से उनके दिमाग में जो दूसरी वाली इमेज फटाक से आती है वो है कि पी के नाली में गिरे रहने वाली. मतलब हद्द है. लड़की शराब पिये तो और भी बुरा है. अब लड़की शराब पीती है यानी उसमें इतनी हिम्मत है कि वो समाज की सो कॉल्ड मान-मर्यादाओं को लात मार के आगे बढ़ रही है. लेकिन जब शराब की बोतल टूट जाती है तो फिर ये क्यों दिखाना होता है कि भई हम तो शराब पीते ही नहीं हैं?

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Photo:  Pixabay

असल कहानी ये है कि जिस घर में मैं रहता हूं उसकी पहली मंजिल पर तीन लड़कियां रहने आईं. कुछ दिन पहले ही. एक रात उन्होंने छत पर शराब पी. गाने बजाकर खूब धमाल किया और धमाल में बोतल भी फोड़ दी. बोतल फूटी और पूरी छत पर बीयर की गंगा-युमना सब बह गई। उन्होंने न तो टूटी बोतल उठाई और न छत साफ की, चुपचाप अपने कमरे में पहुंच गईं। दो दिन बाद जब मकान मालिक को ये पता चला तो सबसे पहले बिल्डिंग में रहने वाले लड़के को ही धरा जाएगा. खासकर तब जब वह सबसे ऊपर वाले फ्लोर पर रहता हो. क्या है कि मकान मालिकों को भी अभी यही लगता है कि शराब तो सिर्फ लड़के पीते हैं. लड़कियां तो सिर्फ शराब का नाम पढ़कर आचमन कर लेती हैं उसी से उनका नशा पूरा हो जाता है.

मकान मालिक का फोन आया. फोन उठाते ही भाई साब गरजे- छत साफ करवाओ.
जवाब- क्यों क्या हुआ?
फिर गरजे- वो जो बोतल तोड़ी है, गंदा किया है, उसे कौन साफ करेगा.
जवाब- जिसने किया है वो करेगा. मैं क्यों करूं.
फिर गरजे- तुमने नहीं किया तो किसने किया है?
जवाब- फर्स्ट फ्लोर.
ये वाला जवाब सुनते ही गरज ठंडी हो चुकी थी. बादल बिना बरसे ही लौट गए थे. धीरे से पहली मंजिल वाली एक लड़की को सुरीली आवाज दी जाती है. उसने बेहद सादगी के साथ मना कर दिया कि भई हम तो शराब पीते ही नहीं हैं.
भाई साब फिर गरजे- यार वो तो मना कर रही हैं।
जवाब- किया उन्होंने ने ही है. बाकी आप देख लो.
अब क्या कि वो वाला डायलॉग सुना है ना- हर कातिल कोई न कोई सबूत जरूर छोड़ जाता है. तीन में से किसी एक लड़की का बाल बांधने वाला क्लचर वहीं गिर गया था छत पर. भाई साब को अब पुख्ता हो गया कि शराब किसने पी है. उन्होंने फिर धीरे से आवाज दी और कहा- वो सब साफ करवा देना. और निकल लिए चिलम पीने.

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अब असली सवाल यहां आता है कि जब महिलाएं सशक्त हो रही हैं. अपनी मर्जी से शराब भी पी रही हैं तो फिर उन्हें ये कहने में क्या जाता है कि हां बोतल भी हमने तोड़ी है. वहां पर बराबरी क्यों सुसाइड कर लेती है और पड़ोसी पर गैरइरादतन हत्या टाइप इल्जाम लगा दिया जाता है. शराब पीनी है खूब पीजिए. लेकिन बोतल तोड़िए तो फिर उसको फेंक भी दीजिए और छत भी धो दीजिए. वहां पर क्यों दूसरे की ओर उंगली घुमा दी जाती है? एक और बात, अगर समाज की ‘सो कॉल्ड’ मर्यादा को आप नहीं मानती हैं तो फिर ये कहने में कौन सा आसमान फट रहा है कि छत पर शराब के संगम पर नाव आपने ही चलाई थी. सिर्फ शराब की बोतल ही मत तोड़िए, इसके बाद चुप हो जाने वाली परंपरा भी तोड़िए.

अ गर्ल विद सिली क्वेश्चन्स…

उसके पास सवालों की कमी नहीं होती. हर तीसरी बात के बाद एक सवाल जरूर तैयार रहता. सवाल पूछने से पहले थोड़ा अटकती और फिर धीरे से कहती- आई हैव अ सिली क्वेश्चन…! दोनों इसी बात जोर से हंसते और आगे फिर सवालों-जवाबों में खोए रहते. हाय-हैलो से शुरू हुआ बातों का सिलसिला आगे बढ़ा और मिनटों की बातें घंटों में बदलने लगीं. दिन महीने में तब्दील हो गए और उनकी करीबियत और भी करीब होती गई.

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हजार किलोमीटर दूर होने के बाद भी उनके बीच फासला नहीं था. सफर पर एक साथ निकलते तो दूर रहने वाली फीलिंग लापता हो जाती. खासकर मौसम बारिश का हो तो सफर कुछ ज्यादा सुहाना हो जाता है. ऐसे सफर में बस की खिड़की पर लगे शीशे के उस पार गिरती पानी की बूंदों को भीतर से छूने की कोशिश करते हुए वह मुस्कुराती और उसके बगल बैठकर मैं उसे यूं देखकर खुश होता. ये छोटी-छोटी खुशियां हमें बिना किसी जोर के बांध देती हैं. प्यार से. जिससे हम अलग नहीं होना चाहते. बंधे रहना चाहते हैं. बारिश से उसका ध्यान हटता तो वह और सवाल पूछने लगती और फिर शरमाते हुए अपने ही सवालों पर हंसती.

जब दूरी बोझ बनने लगती तो उनमें से कोई एक अपना झोला उठाकर चल देता. एक रात उसने झोला उठा लिया. बिना बताए. सरप्राइज विजिट. प्लान था कि सुबह दरवाजा नॉक करके अपनी शक्ल दिखाई जाएगी, लेकिन भारतीय रेल की महानता ने सारा प्लान चौपट करा दिया और प्लान हवा हो गया. प्लान चौपट होने पर जितनी गालियां मन ही मन उसने मुझे दी होंगी उसकी चार गुनी सुरेश प्रभु को भी पड़ी होंगी.

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अगली सुबह तमाम चिंताओं, शंकाओं और संभावनाओं के बीच आखिरकार उनकी मुलाकात हुई. मिले, बातें हुईं और फिर बातें रुकी नहीं. कई दिनों तक. वो साथ में किताबें पढ़ते, फिल्में देखते और जब ऊबने लगते तो बातें करते. दुनिया जहान ही. बस एक बात जो वो नहीं करते थे वो था उनका फ्यूचर. घर के पर्दे का रंग और बच्चों के नाम उन्होंने कभी नहीं सोचे. वो एक-दूसरे को जानते नहीं थे लेकिन फिर भी एक-दूसरे को बेहतर ढंग से जानते थे. अक्सर रात में दोनों चांद की रोशनी के नीचे कॉफी पीते हुए बातें करते. लंबी बातों के बीच वह सवाल पूछना नहीं भूलती थी.

नौकरी करने वालों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल होती है दफ्तर जाकर शक्ल दिखाने की. भले ही पूरे मन से कोई काम हो पाए या नहीं. दफ्तरिया जिंदगी बिताने और दोबारा मिलने के वादे के साथ वो अलग हो गए. दूर होने वाला जो गैप होता है ना, वो किलोमीटर वाले फासले से ज्यादा दिमागी चकरघिन्नी होता है. आप अंदर से खुश रहते हो, लेकिन दिमाग के किसी कोने में दूर होने वाला अलार्म घनघनाता रहता है. दोनों फिर झोला पैक करने की प्लानिंग करने लगते हैं. कई दिन बाद बातचीत के दौरान उसने चांद देखते हुए गहरी सांस ली और हंसते हुए कहा- ‘आई हैव अ सिली क्वेश्चन.’ और फिर वो दोनों अब तक पूछे गए सारे सवाल याद करके ठहाके लगाने लगे.

परसेप्शन: चेहरे के पीछे का चेहरा

रास्ते, मंजिलें और लोग. कई बार इन सब के बारे में हम खुद बिना कुछ जाने बहुत कुछ जानते होते हैं. दूसरों से. हमारे आस-पास के लोग अपने आस-पास के लोगों और जगहों की छवियां अपने ढंग से पेश करते हैं. किसी से मिलने से पहले हमें उसकी ‘कुंडली’ बताने वाले लोग बहुत मिल जाएंगे. लेकिन ये कुंडली कितनी सच होती है इस राज से पर्दा तो तभी उठता है जब हम खुद उस शख्स से रूबरू होते हैं. मैंने देखा है कि बहुतेरे लोग जिस शख्स को लंपट करार देते हैं, वो बहुत ही बेहतरीन आइडिया के साथ हमसे मिलता है. कुछ ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ जुबानी शेर होते हैं. हकीकत से परे, दीन-दुनिया और हालातों से बेफिकर, जो खुद गुमराह होते हैं वो अक्सर दूसरों को उसी राह पर ले जाने का भी काम करते हैं. नियम और शर्तें लागू. लेकिन उनका पी.आर. तो ऐसे किया जाता है जैसे पूरी मानवता को बस उन्हीं के नक्शेकदम पर चलना चाहिए, वरना सृष्टि का विनाश संभव है.

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किसी ऐसे शख्स से मिलने जाते वक्त वो सारी छवियां आपके सामने बारी-बारी से आएंगे, घूमेंगी और इंडिकेटर की तरह जलती-बुझती सी रहेंगी. जब दो अनजान शख्स मिलते हैं तो बातचीत की शुरूआत काफी रोचक होती है. दोनों मिलेंगे. किसी कोने वाली टेबल पर जाकर बैठ जाएंगे. और पांच मिनट तक खामोश रहेंगे. फिर अपने-अपने मोबाइल की स्क्रीन पर देखते हुए धीरे से एक-दूसरे की ओर देखकर हंसेंगे. हंसी का वो हल्का झोंका ही उनकी बातचीत की शुरूआत होती है. बातों-बातों में वे एक-दूसरे को जानेंगे या जानने की कोशिश करेंगे. पहले से गढ़ी हुई कुछ छवियां टूटेंगी तो कुछ नई छवियां गढ़ती जाएंगी. अलविदा का वक्त आने तक उसी इंसान की एक नई छवि लेकर आप लौट आएंगे. वही उस इंसान के बारे में आपका ‘परसेप्शन’ होगा.

दरअसल परसेप्शन वही छवियां हैं जो हम बुन लेते हैं किसी के बारे में. शायद अपने अनुभवों से या किसी की दिखाई गई तस्वीर से. जरूरी नहीं कि सामने वाला ऊपर से जैसा हो वो अंदर से भी वैसा हो, लेकिन कई बार हम इसे नजरअंदाज करते हैं. मन के किसी कोने में रखे खांचों में उस शख्स की छवि गढ़ लेते हैं. जैसे खांचों में मिट्टी भरकर मुखौटे बनाए जाते हैं. ठीक वैसे ही. लेकिन खांचा कितना अच्छा क्यों न हो अगर मिट्टी सही नहीं होगी तो वो बिगड़ जाएगा. कई बार दोष मिट्टी का नहीं खांचों का भी होता है. और कई बार सब कुछ सही होने के बावजूद यह सब उस शख्स पर भी निर्भर करता है जो यह बनाने की इच्छा पाल के बैठा है.

परसेप्शन बना लेना अच्छा है, लेकिन सही मायनों में परसेप्शन कितना सही है ये भी जरूरी है. कई बार हम जो सोचते हैं वो सौ फीसदी सच होता है लेकिन अक्सर ऐसा नहीं भी होता. हमारी सोच से इतर भी मुखौटे होते हैं. जिन पर नकाब चढ़े होते हैं. ऊपर से हंसी लिए बैठा इंसान मन ही मन आपसे कितना कुढ़ रहा होता है आप जब तक जानेंगे, देर हो चुकी होती है. असल जिंदगी में नकाब चढ़े इन मुखौटों को परखना ही सबसे बड़ा चैलेंज होता है.

अइसा अतिथि देवो न भव!

वैधानिक चेतावनी- चिलगोजर दोस्तों को घर पर ना बुलाएं. चैन सुख छिन जाएगा. जीना हराम हो जाएगा. प्राइवेसी की लंका लग जाएगी. अउर रही सही कसर तब पूरी हो जाएगी जब जाते-जाते वो मुंह बना के जाएंगे. जैसे बारात में लौंडे का फूफा रिसा के फुफकार मारने लगता है.

हाल ही में चड्ढी बड्डी आई मीन बचपन के दोस्त चंपू कुलकुले का घर आना हुआ. भाई साब आए. तीन दिन बिस्तर तोड़ा. घर नरक कर दिए वो अलग. टॉवेल से लेकर परफ्यूम की बोतल तक उनके पसीने की गंध मौजूद है. उबकाई आ रही है. सोच रहा हूं वो सारा सामान एक म्यूजियम में रखवा दूं. ताकि बाकी लोग भी वो सब देख के धन्य हो सकें.

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भाई साहेब का एग्जाम था. पढाई से ज्यादा उनका मन हमाए लैपटॉप पर किस किस की फोटो पड़ी है, ये जानने में लगा था. उसमें नीली वाली पिच्चरें आई मीन ब्लू फिल्में है या नहीं ये जाने बिना तो वो एग्जाम देने को भी तैयार ना थे. वो ये जानने में इंटरेस्टेड थे कि जब अकेले रहता हूं घर में तो डबल बेड क्यों लगा है. मन तो किया रात में ही छत पे ले जा के टंकी से लटका दूं. फिर बचपन की दोस्ती का ख्याल आ गया.

संडे को एक दोस्त से मिलना था. इतना सुनते ही उनके शरीर के सारे अंग ऐसे फड़के जैसे किसी ने कमोड वाली टंकी पे मिर्ची घोल दी हो. उनको भी उस दोस्त से मिलना था. क्यों? ये जानने के लिए कि वो लड़का है या लड़की. और अगर लड़की है तो वो पक्का उनकी भाभी ही होगी. क्या है कि उनकी डिक्शनरी में आज तक लड़की का दोस्त होना लिखा ही नहीं. वो बस माल ही हो सकती है. दोस्त नहीं. आखिरकार जब शाम को छह फुट का लड़का सामने देखे तो भाई साब की टपकती लार सूख के लातूर हो गई.

अगले दिन साहेब का एग्जाम था और हमरा दफ्तर. वापस लौटे तो उनकी ख्वाहिश खरीदारी की जागी. नोएडा के विश्वप्रसिद्ध अट्टा मार्केट से उनको अपनी प्रेमिकाओं के लिए तोहफे लेने थे. चार बजे की कर्री धूप में. फिर उनको याद आया कि किसी पड़ोस के चाचा ने कोई दवाई का नाम भेजा है वो भी लेनी है. दवाई के लिए 75 मेडिकल छाने लेकिन मिली नहीं. इत्ते पर भी उनका जी नहीं भरा. चश्मा खरीदना है. जो तुम कहोगे वही वाला. और जो कहोगे कि ये ले लो, वो वाला अच्छा नहीं है. अबे टपूचिये जब इतने ही बुद्धिजीवी थे तो खरीद लेते. खैर. ये भी निपटा. ट्रेन छूटने में डेढ़ घंटा है और स्टेशन पहुंचने में एक घंटा लगेगा. लेकिन उनको घंटा फरक नहीं पड़ता कि जाम भी मिल सकता है. अभी बेल्ट भी लेनी है. मन तो किया उहै बेल्ट लेके वेमुला बना दूं. फिर याद आया- अतिथि देवो भव.